PURAANIC SUBJECT INDEX

पुराण विषय अनुक्रमणिका

(From vowel i to Udara)

Radha Gupta, Suman Agarwal and Vipin Kumar

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I - Indu ( words like Ikshu/sugarcane, Ikshwaaku, Idaa, Indiraa, Indu etc.)

Indra - Indra ( Indra)

Indrakeela - Indradhwaja ( words like Indra, Indrajaala, Indrajit, Indradyumna, Indradhanusha/rainbow, Indradhwaja etc.)

Indradhwaja - Indriya (Indradhwaja, Indraprastha, Indrasena, Indraagni, Indraani, Indriya etc. )

Indriya - Isha  (Indriya/senses, Iraa, Iraavati, Ila, Ilaa, Ilvala etc.)

Isha - Ishu (Isha, Isheekaa, Ishu/arrow etc.)

Ishu - Eeshaana (Ishtakaa/brick, Ishtaapuurta, Eesha, Eeshaana etc. )

Eeshaana - Ugra ( Eeshaana, Eeshwara, U, Uktha, Ukhaa , Ugra etc. )

Ugra - Uchchhishta  (Ugra, Ugrashravaa, Ugrasena, Uchchaihshrava, Uchchhista etc. )

Uchchhishta - Utkala (Uchchhishta/left-over, Ujjayini, Utathya, Utkacha, Utkala etc.)

Utkala - Uttara (Utkala, Uttanka, Uttama, Uttara etc.)

Uttara - Utthaana (Uttara, Uttarakuru, Uttaraayana, Uttaana, Uttaanapaada, Utthaana etc.)

Utthaana - Utpaata (Utthaana/stand-up, Utpala/lotus, Utpaata etc.)

Utpaata - Udaya ( Utsava/festival, Udaka/fluid, Udaya/rise etc.)

Udaya - Udara (Udaya/rise, Udayana, Udayasingha, Udara/stomach etc.)

 

 

 

Puraanic contexts of words like Isheekaa, Ishu/arrow etc. are given here.

Comments on Ishu

इषीका देवीभागवत ५.२६.५१( चण्डिका देवी द्वारा मुण्ड असुर के शरों को इदषिकास्त्रों से नष्ट करने का उल्लेख ), ब्रह्म १.७.२७( तारा द्वारा ईषिका स्तम्ब पर सोम के वीर्य से प्राप्त गर्भ को त्यागना? ), १.१२९.८९( आत्मा व इन्द्रियों के पृथकत्व - अपृथकत्व की इषीका और मुञ्ज की पृथकता - अपृथकता से तुलना ), ब्रह्मवैवर्त्त ३.१४.२९( अग्नि द्वारा शिव के वीर्य को शरकानन में त्यागना, शरों के कुमार कार्तिकेय की उत्पत्ति का वृत्तान्त ), भागवत १०.१९.२( गोपों की गायों का गर्मी से व्याकुल होकर इषीका/मुञ्ज वन में प्रवेश, मुञ्जवन में आग लगना, कृष्ण द्वारा गोपों आदि की दावानल से रक्षा का वृत्तान्त ), मत्स्य १५३.९८( तारकासुर सङ्ग्राम के संदर्भ में जम्भ असुर द्वारा ऐष्टीकास्त्र से इन्द्र के वज्रास्त्र को नष्ट करना, इन्द्र द्वारा आग्नेयास्त्र से ऐष्टीकास्त्र को शान्त करना ), वायु ९०.३८/२.२८.३८( तारा द्वारा ईषिका स्तम्ब पर सोम के वीर्य से प्राप्त गर्भ को त्यागना? ), स्कन्द १.२.२१.९२( तारकासुर सङ्ग्राम में इन्द्र द्वारा वज्रास्त्र से असुरों पर शिला वर्षण करने पर जम्भ असुर द्वारा इषीकास्त्र से वज्रास्त्र का नाश करना, इषीकास्त्र के तेज से देवों की सेना के जलने पर इन्द्र द्वारा आग्नेयास्त्र से इषीकास्त्र का नाश करना ), ४.१.१५.४२( बृहस्पति - पत्नी तारा द्वारा चन्द्रमा से धारित गर्भ को इषीका स्तम्ब पर त्यागना तथा बुध के जन्म का वृत्तान्त ), ५.१.२८.९०( तारा द्वारा इषीकास्त्र से स्व गर्भ को च्युत करने का उल्लेख ), ६.१७१.६( वसिष्ठ द्वारा विश्वामित्र को द्विज न कहने पर विश्वामित्र द्वारा ब्रह्मास्त्र से वसिष्ठ पर प्रहार, वसिष्ठ द्वारा इषीका पर ब्रह्मास्त्र को अभिमन्त्रित करके विश्वामित्र के ब्रह्मास्त्र को नष्ट करना ), महाभारत आदि ६३.९४( पूर्व जन्म में पक्षी को इषीका द्वारा विद्ध करने के कारण अणी माण्डव्य ऋषि द्वारा इस जन्म में शूली पर चढना ), १३०.२७( आचार्य द्रोण द्वारा इषीका मुष्टि की सहायता से पाण्डवों की कूप में पडी वीटा/गुल्ली को बाहर निकालने का वृत्तान्त ), उद्योग ९६.२९( नर व नारायण द्वारा इषीकास्त्र से ही दम्भोद्भव राजा के गर्व का खण्डन करना ), सौप्तिक १३.१९, १५.३१( अश्वत्थामा द्वारा इषीका पर ब्रह्मास्त्र का अभिमन्त्रण करके उसे पाण्डवों के गर्भ पर छोडना ), शान्ति २४८.२४( आत्मा व बुद्धि में सम्बन्ध प्रदर्शन के लिए इषीका व मुञ्ज के सम्बन्ध वाले सार्वत्रिक श्लोक ), ३४२.११५( नर द्वारा रुद्र के विघातार्थ इषीका को मन्त्रों से योजित करने पर इषीका का परशु बनना, रुद्र द्वारा परशु को खण्डित करने का उल्लेख ), आश्वमेधिक १९.२२( शरीर की मुञ्ज व आत्मा की इषीका से तुलना; इषीका को मुञ्ज से निकाल कर देखने का निर्देश ), ६६.१७+ ( इषीकास्त्र से मृत उत्तरा के गर्भ का कृष्ण की कृपा से जीवित होने का वृत्तान्त ) Isheekaa/ ishika

Remarks on Isheekaa 

इषु गर्ग ७.६.१६( कृष्ण - पुत्र दीप्तिमान् द्वारा राजा मय के सारथी को १, ध्वजा को २, रथ को २०, कवच को ५ तथा धनुष को १०० बाणों द्वारा नष्ट करना ), ७.९.१६( शिशुपाल द्वारा दत्तात्रेय से प्राप्त ब्रह्मास्त्र, परशुराम से प्राप्त अङ्गारास्त्र तथा अगस्त्य से प्राप्त गजास्त्र का प्रद्युम्न पर प्रयोग, प्रद्युम्न द्वारा क्रमश: ब्रह्मास्त्र, पर्जन्यास्त्र व नृसिंहास्त्रों द्वारा उपरोक्त अस्त्रों को शान्त करना ), ७.१८.१७( राजा दीर्घबाहु की कन्या के स्वयंवर में कृष्ण के प्रद्युम्न, साम्ब, अनिरुद्ध आदि १८ पुत्रों व पौत्रों द्वारा कांच के जलपूर्ण पात्र के बाणों से भेदन का वृत्तान्त ), ७.२१.२५( कौरव - यादव युद्ध में कृष्ण - पुत्र भानु द्वारा वायव्यास्त्र से द्रोणाचार्य के पर्वतास्त्र को शान्त करना ), ७.२१.२७( कौरव - यादव युद्ध में कृष्ण - पुत्र साम्ब द्वारा पर्जन्यास्त्र से बाह्लीक के आग्नेयास्त्र को शान्त करना; पर्जन्यास्त्र की ज्ञान से व आग्नेयास्त्र की अहंकार से उपमा ), ७.२१.३२( साम्ब द्वारा कौरव - वीर अश्वत्थामा पर १०, धौम्य पर १६, लक्ष्मण पर १०, शकुनि पर ५, दु:शासन पर २०, सञ्जय पर २०, भूरिश्रवा पर १०० तथा यज्ञकेतु पर १०० बाणों द्वारा प्रहार करना ), ७.२४.१४( नलकूबर यक्ष द्वारा कृतवर्मा पर ५, अर्जुन पर १० तथा दीप्तिमान् पर २० बाणों से प्रहार ), ७.२४.४७( साम्ब द्वारा कार्तिकेय पर प्रहार करने वाले बाण के एक से १०, १००, सहस्र व कोटि रूप धारण करने का उल्लेख ), ७.२९.१४( प्रद्युम्न द्वारा वायव्यास्त्र के प्रयोग से मधुमक्खियों से मुक्ति पाना ), ७.३८.२३( असुर शकुनि द्वारा अर्जुन पर १०, गद पर २०, अनिरुद्ध पर ४० तथा साम्ब पर १०० बाणों द्वारा प्रहार, प्रद्युम्न द्वारा शकुनि के धनुष की प्रत्यञ्चा को १०, अश्वों को सहस्र, रथ को सौ विशिखों तथा सारथी को २० बाणों द्वारा नष्ट करना ), ७.३९.१३( शकुनि द्वारा प्रद्युम्न - सेना पर मयासुर से प्राप्त रौरवास्त्र का प्रयोग, प्रद्युम्न द्वारा गरुडास्त्र से शान्ति ), ७.३९.१९( प्रद्युम्न द्वारा शकुनि द्वारा प्रयुक्त पैशाची माया की सत्वास्त्र द्वारा, गुह्यकी माया की शूकरास्त्र द्वारा, गान्धर्वी माया की ज्ञानास्त्र द्वारा, राक्षसी माया की नृसिंहास्त्र द्वारा शान्ति का वर्णन ), ७.४१.३७( शकुनि के मृत शरीर के भूमि पर गिरने पर पुन: जीवित होने की विचित्रता के कारण दीप्तिमान्, साम्ब आदि यादव वीरों द्वारा उसके शिर को बाणों से आकाश में उछालने का वर्णन ), ७.४७.३४( शक्रसख द्वारा अर्जुन पर १०, साम्ब व अनिरुद्ध पर १००-१००, गद पर २०० व सारण पर १००० बाणों द्वारा प्रहार ), १०.१५.१२( नीलध्वज द्वारा साम्ब के धनुष को १०, चारों अश्वों को ४, रथध्वज को २, रथ को १०० और सारथि को १ बाण से नष्ट करना ), १०.२०.११( साम्ब द्वारा बक असुर पर ५ नाराचों द्वारा प्रहार ), १०.२४.२९( अनुशाल्व द्वारा साम्ब के ४ अश्वों को ४, ध्वज को २, सारथि को ३, धनुष को ५ तथा रथ को ३० बाणों से नष्ट करना; साम्ब द्वारा १०० बाणों से अनुशाल्व पर प्रहार, अनिरुद्ध द्वारा अनुशाल्व के मयासुर से प्राप्त ब्रह्मास्त्र को ब्रह्मास्त्र से शान्त करना, आग्नेयास्त्र को वारुणास्त्र तथा वायव्यास्त्र को पर्वतास्त्र से शान्त करना ), १०.२७.९( यादव वीरों द्वारा पाञ्चजन्य द्वीप पर पहुंचने के लिए समुद्र पर बाणों का सेतु बनाने के संदर्भ में केवल अनिरुद्ध, साम्ब और दीप्तिमान् के बाणों का समुद्र के पार तक पहुंचने का वर्णन ), १०.३१.३०( साम्ब द्वारा दिव्य बाण से असुर कुशाम्ब को रथ सहित सूर्यमण्डल में पंहुचा देने का वर्णन ), १०.३४.१९( बल्वल असुर द्वारा यादव - सेनानियों में से इन्द्रनील पर ३, हेमाङ्गद पर ६, अनुशाल्व पर १०, अक्रूर पर १०, गद पर १२, युयुधान पर ५, कृतवर्मा पर ५, उद्धव पर १० तथा प्रद्युम्न पर १०० बाणों द्वारा प्रहार ), १०.३४.३३( कुनन्दन असुर कुमार द्वारा साम्ब पर १०, मधु पर ५, बृहद्बाहु पर ३, चित्रभानु पर ५, वृक पर १०, अरुण पर ७, सङ्ग्रामजित् पर ५, सुमित्र पर ३, दीप्तिमान् पर ३, भानु पर ५, वेदबाहु पर ५, पुष्कर पर ७, श्रुतदेव पर ८, सुनन्दन पर २०, विरूप पर १०, चित्रभानु पर ९, न्यग्रोध पर १० तथा कवि पर ९ बाणों द्वारा प्रहार ), १०.३५.२८( बल्वल असुर द्वारा यादव सेना पर मयासुर की माया का प्रयोग, अनिरुद्ध द्वारा मोहनास्त्र से माया की शान्ति, बल्वल द्वारा प्रयुक्त गान्धर्वी माया के प्रभाव का वर्णन ), १०.३६.२३( कृष्ण - पुत्र सुनन्दन द्वारा कुनन्दन असुर कुमार पर १० बाणों द्वारा प्रहार, बाणों द्वारा असुर कुमार का रक्त पीकर भूमि पर गिरना, बाणों के भूमि पर गिरने की तुलना मिथ्या साक्षी देने वाले पुरुष के पितरों के गिरने से करना ), १०.३६.३८( सुनन्दन द्वारा कुनन्दन पर प्रयुक्त बाण के आधे अग्र भाग द्वारा ही कुन्दन के सिर के कटने का वर्णन ), देवीभागवत ५.९.१४( महिषासुर वधार्थ देवों के तेज से उत्पन्न देवी को मारुत/वायु द्वारा बाणों से पूर्ण इषुधि भेंट करने का उल्लेख ), १२.७.१९( दीक्षा कर्म में शरमन्त्र? के उच्चारण का निर्देश ), पद्म ५.२३.६३( रामाश्वमेध प्रसंग में राजा सुबाहु के पुत्र विक्रान्त तथा शत्रुघ्न - सेनानी राजा प्रतापाग्र्य द्वारा एक दूसरे पर बाणों द्वारा प्रहार; विक्रान्त द्वारा छोडे गए बाणों की भक्ति से विमुख होने की संज्ञा ), ६.२०६.५( पुष्पेषु : काम्पिल्य नगरी में पुष्पेषु ब्रह्मचारी के रूप पर स्त्रियों की आसक्ति का वर्णन ), ब्रह्म १.१०३.२३( दस्युओं से कृष्ण के स्त्रीधन की रक्षा करने में अर्जुन के शरों का असफल होना ), ब्रह्मवैवर्त्त २.२९.१४( शरकुण्ड :- यम की संयमिनी पुरी में स्थित ८६ कुण्डों में से एक ), ४.१.३५.४२( ब्रह्मा द्वारा स्वपुत्र काम को सम्मोहन, समुद्वेग आदि बाण प्रदान करना, कामदेव द्वारा ब्रह्मा पर बाणों की परीक्षा का वृत्तान्त ), भविष्य २.२.७.२७( बाण - विद्ध षष्ठी तिथि के त्याग का निर्देश ), ३.३.२४.९२( सुखखानि द्वारा हव्यदेव की आराधना द्वारा पावकीय शर की प्राप्ति तथा उसके द्वारा रक्तबीज के अवतारों के नाश का कथन ), ३.४.१२.४०( त्रिपुर नाश हेतु शिव के पिनाक धनुष में शेष का गुण बनना, शुक्र का बाण होना, वह्नि व वायु का शर के पक्ष बनना तथा विष्णु का शल्य बनना ), भागवत १.८.१०( अश्वत्थामा द्वारा अभिमन्यु - पत्नी उत्तरा के गर्भ पर छोडे गए तप्तायस शर के संदर्भ में उत्तरा द्वारा कृष्ण से गर्भ की रक्षा तथा शर से स्व - काम के दहन की प्रार्थना ), ४.११.३( ध्रुव व यक्षों के युद्ध के संदर्भ में ध्रुव द्वारा नारायण अस्त्र के प्रयोग से सुवर्ण  पुंख व कलहंस वास वाले बाणों का निकलना ), ६.९.१३( वृत्रासुर का उत्पन्न होने के पश्चात् प्रतिदिन इषुमात्र वर्धन करने का उल्लेख ), ७.१०.६६( शिव द्वारा त्रिपुर दहन के संदर्भ में तप के धनुष व क्रिया के शर का उल्लेख ), ७.१५.४२( ओंकार रूपी धनुष पर जीव रूपी शर व परम के लक्ष्य का उल्लेख ), ८.११.२३( नमुचि द्वारा इन्द्र पर स्वर्ण  पुंख वाले १५ महा इषुओं द्वारा प्रहार का उल्लेख ), १०.७६.१८( प्रद्युम्न द्वारा शाल्व को १००, शाल्व - सेनापति को २५, शाल्व - सैनिकों को १-१, सारथियों को १०-१० तथा वाहनों को ३-३ शरों से पीडित करने का उल्लेख ), ११.९.१३( दत्तात्रेय द्वारा मन को वश में करने के लिए इषुकार से प्राप्त शिक्षा का वर्णन ), ११.३०.३३( जरा व्याध द्वारा मुसल खण्ड से युक्त इषु द्वारा चतुर्भुज कृष्ण के पाद का वेधन करना ), मत्स्य १३३.४१( शिव द्वारा त्रिपुर दहन हेतु संवत्सर रूपी धनुष, उमा रूपी ज्या तथा विष्णु, सोम व अग्नि देवों से इषु की रचना; वासुकि नाग द्वारा इषु में विष का संचार ), १३६.५८, १३६.६५( विष्णु द्वारा शिव रथ को संभालने के लिए व त्रिपुर में अमृत वापी पान के लिए शर से बाहर निकलने और पुन: शर में प्रवेश करने का उल्लेख ), १४०.५३( शिव के इषु द्वारा त्रिपुर को अग्नि, सोम व नारायण रूप में तीन प्रकार से जलाने का उल्लेख ), १५०.१( तारकासुर सङ्ग्राम में यम व ग्रसन असुर के बीच शर युद्ध का सार्वत्रिक वर्णन ), १५३.१८७( तारकासुर द्वारा शक्र पर १००, नारायण पर ७०, अग्नि पर ९०, वायु पर १०, यम पर १०, कुबेर पर ७०, वरुण पर ८, निर्ऋति पर २० तथा ८, मातलि पर ३ तथा गरुड पर १० बाणों द्वारा प्रहार ), १८८.३( बाणासुर के त्रिपुर को नष्ट करने के लिए शिव द्वारा गाण्डीव धनुष में विष्णु को शर बनाकर शल्य में अग्नि तथा मुख में वायु की प्रतिष्ठा करना ), लिङ्ग १.७२.२३( त्रिपुर विनाश हेतु शिव द्वारा मेरु पर्वत से निर्मित धनुष पर संधान किए गए इषु का वर्णन : विष्णु इषु, सोम शल्य, कालाग्नि अनीक/मुख, वायुएं वाजक/पुच्छ ), विष्णु ४.१९.२( रौद्राश्व के ऋतेषु आदि इषु प्रत्यय वाले १० पुत्रों के नाम ), ५.३८.२३( कृष्ण के स्वर्गधाम गमन के पश्चात् कृष्ण - पत्नियों की म्लेच्छों से रक्षा करने में अर्जुन के अग्नि - प्रदत्त शरों का असफल होना ), विष्णुधर्मोत्तर १.२१३.९( विन्ध्याचल पर्वत द्वारा तप करके ब्रह्मा से प्रतिदिन इषुपात् के बराबर वर्धन करने का वर प्राप्त करना ), २.१६.२०( शरत्काल में शरों के संग्रह करने का निर्देश तथा उनको संस्कारित करने की विधि ), ३.३२८.५८( जल द्वारा पुरुष की शुद्धि की परीक्षा? के अन्तर्गत इषुमोक्षण तथा प्रतिग्रहण तक के समय तक पुरुष के जल में निमग्न रहने का कथन ), शिव २.५.२१.३( जलन्धर वध प्रसंग में निशुम्भ द्वारा कार्तिकेय के वाहन मयूर पर पांच बाणों द्वारा प्रहार, कार्तिकेय द्वारा पांच बाणों द्वारा निशुम्भ के सारथी पर प्रहार आदि ), ५.४६.२२( मारुत द्वारा महिषासुर वधार्थ उत्पन्न देवी को चाप तथा बाणों से पूर्ण इषुधि प्रदान करना ), ७.१.२१.३४( वीरभद्र द्वारा बाण से दक्ष के मृग रूप धारी यज्ञ का शिर काटना ), स्कन्द  १.१.२१.५९( कामदेव द्वारा तपोरत शिव को मोहित करने के लिए पांच बाणों का सन्धान करना, मोहन नामक शर से विद्ध करना, दक्षिiण दिशा में स्थित काम का दग्ध होना आदि ), १.२.२१.७४( तारकासुर सङ्ग्राम में जम्भ असुर द्वारा शक्र के जत्रु, हृदय व स्कन्ध में क्रमश: १०, ३ व २ शरों द्वारा आघात करने का उल्लेख ), १.२.२१.१४८( इन्द्र द्वारा अघोर मन्त्र से अभिमन्त्रित बाण द्वारा जम्भ का वध करना ), ६.१८५.६६( अतिथि द्वारा इषुकार से चित्त निरोध की शिक्षा प्राप्त करने का वर्णन ), हरिवंश १.४१.१३२( रामचन्द्र द्वारा विराध व कबन्ध राक्षसों पर प्रयोग किए गए शरों के स्वरूप का कथन ), १.४४.३३( तारकासुर सङ्ग्राम में सर्पों के देवों के शर बनने का उल्लेख ), २.५९.५६( कृष्ण द्वारा रुक्मिणी हरण प्रसंग में कृष्ण व रुक्मी के महारथियों द्वारा एक दूसरे पर प्रयुक्त किए गए शरों की संख्याओं का कथन ), २.६०.८( रुक्मी व कृष्ण आदि द्वारा एक दूसरे पर प्रयुक्त शरों की संख्याओं का कथन ), २.९६.४६( प्रद्युम्न द्वारा वज्रनाभ असुर के सैनिकों पर प्रयुक्त शरों के स्वरूप का कथन ), २.१२७.९( अनिरुद्ध - बाणासुर - उषा प्रसंग में गरुड को देखकर अनिरुद्ध के शरीर में स्थित शर रूप महासर्पों का प्राकृत शरों में रूपान्तरित होने का कथन ), ३.३२.२३( दक्ष यज्ञ विध्वंस प्रसंग में शिव द्वारा क्रतु/यज्ञ को शर से विद्ध करना, क्रतु का आकाश में मृगशिरा नक्षत्र के रूप में स्थित होना, शर के कारण आघात से नि:सृत रुधिर का इन्द्रधनुष रूप में रूपान्तरण ), ३.५७.३४( देवासुर सङ्ग्राम में असिलोमा दानव व हरि नामक देवता द्वारा एक दूसरे पर प्रयुक्त शरों के स्वरूपों का कथन ), ३.९४.२९( पौण्ड्रक - सेनानी एकलव्य द्वारा यादव वीरों पर प्रयुक्त शरों की संख्याओं का कथन ), ३.९६.२५( सात्यकि द्वारा पौण्ड्रक वासुदेव पर १० तथा शलभाकार ७० बाणों द्वारा प्रहार करने का कथन ), ३.१३३.७६( त्रिपुर दहन हेतु शर द्वारा बाण को सत्य, ब्रह्मयोग तथा तप नामक तीन वीर्यों से सन्धान करने का कथन ), महाभारत आदि ६१.४८( खाण्डव वन के दाह से संतुष्ट अग्नि द्वारा अर्जुन को गाण्डीव धनुष व बाणों से पूर्ण इषुधि आदि प्रदान करने का उल्लेख ), १३०.३१( पाण्डव कुमारों की कूप में पतित मुद्रिका को द्रोण द्वारा शर की सहायता से बाहर निकालने का वर्णन ), १३१.४०( एकलव्य द्वारा ७ बाणों से श्वान के मुख को भरना तथा द्रोणाचार्य को अङ्गुष्ठ दक्षिणा में देना आदि ), १३२.४( लक्ष्य भेदन प्रतियोगिता में अर्जुन का गृध्र के भेदन में सफल होना; बाणों द्वारा जल में द्रोणाचार्य को ग्राह के बन्धन से मुक्त करने पर ब्रह्मशिर अस्त्र प्राप्त करना ), १८४.१०, १८७.२०( द्रौपदी के स्वयंवर में अर्जुन द्वारा लक्ष्य वेध करके द्रौपदी को प्राप्त करना ), २२६.१३( खाण्डव वन दाह के समय इन्द्र द्वारा अर्जुन पर ऐन्द्रास्त्र के प्रयोग से जल धारा आदि की सृष्टि करना, अर्जुन द्वारा वायव्यास्त्र की सहायता से ऐन्द्रास्त्र का निवारण; अर्जुन द्वारा बाणों से समस्त देवताओं के आयुधों का निवारण ), सभा ८०.१६( द्यूत क्रीडा के पश्चात् व गमन के समय अर्जुन द्वारा मार्ग में सिकता/बालू के वपन का रहस्यार्थ शत्रुओं पर शर वर्षा करना होने का उल्लेख ), वन ३९.३६( वराह रूप धारी मूक दानव वध प्रसंग में किरात रूप धारी शिव द्वारा अर्जुन के समस्त शरों को आत्मसात् करना ), ४०.१५( अर्जुन को शिव से पाशुपत अस्त्र की प्राप्ति ), ४१.२५( अर्जुन द्वारा यम से दण्डास्त्र, वरुण से वरुण पाश तथा कुबेर से अन्तर्धान अस्त्र प्राप्त करना ), ४४.४( अर्जुन द्वारा इन्द्र से वज्रास्त्र व अशनि अस्त्रों की प्राप्ति ), विराट ५४.२०( कौरवों द्वारा अपहृत राजा विराट की गायों की रक्षा के संदर्भ में कर्ण द्वारा अर्जुन पर १२ बाणों से प्रहार आदि ), ५५.३६( अर्जुन द्वारा द्रोण पर ७३/त्रिसप्तति, दुःसह पर १०, अश्वत्थामा पर ८, दु:शासन पर १२, कृपाचार्य पर ३, भीष्म पर ६० तथा दुर्योधन पर १०० बाणों आदि से प्रहार ), ६१.२६( अर्जुन द्वारा दृढ मुष्टि का ज्ञान इन्द्र से तथा कृतहस्तता का ज्ञान ब्रह्मा से प्राप्त करने का उल्लेख ), ६६.८( अर्जुन द्वारा कौरव सेना के विरुद्ध सम्मोहन अस्त्र का प्रयोग ), उद्योग ३३.४३टिप्पणी ( विदुर - धृतराष्ट्र संवाद के अन्तर्गत विदुर द्वारा १, , , , , , , , , १० संख्याओं का रहस्यार्थ प्रकट करना ), ९६.४२टिप्पणी ( काम, क्रोध आदि ८ दोषों के निवारणार्थ काकुदीक प्रस्वापन, शुक/मोहन , नाक/उन्मादन आदि अर्जुन के ८ अस्त्रों का उल्लेख ), १४१.३८( रण रूपी यज्ञ में कर्णि, नालीक, नाराच तथा वत्सदन्त आदि बाणों के प्रकारों की उपबर्हण से तुलना; अर्जुन, द्रोणाचार्य आदि द्वारा छोडे गए इषुओं की परिस्तोमों से तुलना ), १८०.११( अम्बा कन्या के कारण हुए भीष्ण - परशुराम युद्ध में भीष्म द्वारा प्रयुक्त वायव्यास्त्र को परशुराम द्वारा गुह्यकास्त्र द्वारा तथा आग्नेय अस्त्र को वारुणास्त्र द्वारा शान्त करने का उल्लेख ), १८३.१२( भीष्म द्वारा परशुराम पर प्रहार के लिए अष्ट वसुओं से प्रस्वाप व सम्बोधनास्त्र प्राप्त करना ), भीष्म ११८.५०( शिखण्डी के स्त्रीत्व के कारण भीष्म द्वारा उस पर बाणों से प्रहार न करना ), ११९.६१( शिखण्डी को ओट में अर्जुन द्वारा भीष्म पर प्रहार करने पर भीष्म द्वारा पुन: पुन: उन बाणों के शिखण्डी के बाण न होना कहना ), १२०.४५( शर शय्या पर पडे भीष्म के लिए अर्जुन द्वारा तीन शरों से उपधान/तकिये का निर्माण करना ), १२१.२३( शर शय्या पर पडे भीष्म द्वारा जल मांगने पर अर्जुन द्वारा पर्जन्यास्त्र से प्राप्त दिव्य जल से भीष्म को तृप्त करना ), द्रोण २९.४५( अर्जुन द्वारा बाण मारकर राजा भगदत्त द्वारा नेत्रों को खुला रखने के लिए बांधी गई पट्टी को छिन्न करना, राजा भगदत्त के नेत्र रुद्ध होना व अर्जुन द्वारा अर्धचन्द्र बाण से भगदत्त का वध ), ४३.७( अभिमन्यु द्वारा व्यूह भङ्ग प्रसंग में जयद्रथ द्वारा पाण्डव वीरों पर चलाए गए बाणों की संख्याएं : सात्यकि - ३, भीम - ८, धृष्टद्युम्न - ६०, विराट - १० आदि आदि ), ९७.२९( द्रोणाचार्य द्वारा द्रुपद - पुत्र धृष्टद्युम्न के आयुधों आदि को नष्ट करने के लिए प्रयुक्त बाणों की संख्याएं : १०० से शतचन्द्र ढाल?, १० से खड्ग, ६४ से हय आदि ), १४६.५( जयद्रथ वध प्रसंग में अर्जुन द्वारा कौरव सेना पर ऐन्द्रास्त्र के प्रयोग से हजारों अग्निमुख बाण निकलना ), १४६.१०१( जयद्रथ वध के लिए अर्जुन द्वारा शर को इन्द्र के वज्रास्त्र से अभिमन्त्रित करना, बाण द्वारा जयद्रथ के कटे सिर को ढोने का वर्णन ), १८९.११टिप्पणी( धृष्टद्युम्न - द्रोण युद्ध में कर्णी, नालीक, लिप्त, बस्तिक, सूची आदि इषुओं का प्रयोग निषिद्ध होना ), कर्ण २०.२२टिप्पणी ( बाणों की १० गतियों और उनके द्वारा शरीर के विभिन्न अङ्गो पर आघात का वर्णन ), ३४.४९( त्रिपुर दाह प्रसंग में शिव के संवत्सर रूपी धनुष के लिए विष्णु, अग्नि व सोम का इषु बनना ), ८९.१७( कर्ण द्वारा अर्जुन के आग्नेयास्त्र की वारुणास्त्र द्वारा शान्ति, वारुणास्त्र की वायव्यास्त्र से शान्ति, अर्जुन द्वारा प्रयुक्त इन्द्र के वज्रास्त्र को कर्ण द्वारा भार्गवास्त्र से शान्त करना ), ८९.८९( कर्ण द्वारा सारथि कृष्ण पर पांच सर्पों रूपी पांच बाण मारना, अर्जुन द्वारा भल्लों से उन्हें त्रेधा विभक्त करना आदि ), ९०.२०( कर्ण द्वारा अश्वसेन सर्प को शर बनाकर अर्जुन पर छोडना, कृष्ण की युक्ति के कारण अर्जुन के केवल किरीट भङ्ग होने का वर्णन, अश्वसेन द्वारा पुन: कर्ण का बाण बनने में असफलता तथा स्वयं ही अर्जुन पर आक्रमण करना, अर्जुन द्वारा बाण से उसे नष्ट करना ), ९०.८२( कर्ण की मृत्यु के समय भार्गवास्त्र का शाप के कारण विस्मृत होना ), ९०.१०४( अर्जुन द्वारा कर्ण के वध के लिए रौद्रास्त्र का प्रयोग तथा कर्ण के रथ चक्र का पृथिवी में धंसना ), ९१.४०( अर्जुन द्वारा कर्ण वध के लिए प्रयुक्त अञ्जलिक नामक बाण के स्वरूप का वर्णन ), शल्य ११.३२( पाण्डवों द्वारा राजा शल्य पर प्रयुक्त बाणों की संख्या : भीम द्वारा ७, सहदेव द्वारा ५, नकुल द्वारा १० आदि ), सौप्तिक १३.१९+ ( अश्वत्थामा द्वारा पाण्डवों के वध के लिए इषीकास्त्र का तथा अर्जुन द्वारा प्रतिकारार्थ ब्रह्मास्त्र का प्रयोग, वेदव्यास के निर्देश पर अर्जुन द्वारा ब्रह्मास्त्र को लौटाने में सफल होना व अश्वत्थामा का असफल होना, ब्रह्मास्त्र के लौटाने के लिए ब्रह्मचर्य की आवश्यकता का उल्लेख ), शान्ति २९५.३२( रसना, दर्शन, घ्राण आदि इन्द्रियों से इषुप्रपात मात्र रति सुख मिलने का उल्लेख ), अनुशासन १४.२५८( शिव के पिनाक धनुष के लिए पाशुपत शर के स्वरूप का वर्णन : सपादकार, एकपाद, सहस्रशिर, भुजाएं, जिह्वाएं, नेत्र आदि; त्रिपुर दाह के लिए शिव द्वारा पाशुपत अस्त्र का प्रयोग इत्यादि ), योगवासिष्ठ ३.४८.२८+ ( राजा सिन्धु व राजा विदूरथ द्वारा एक दूसरे पर प्रयुक्त नागास्त्र - सुपर्णास्त्र, तमोस्त्र - सूर्यास्त्र, राक्षसास्त्र - नारायणास्त्र, आग्नेयास्त्र - वारुणास्त्र, शोषणास्त्र - पर्जन्यास्त्र, वायव्यास्त्र - पर्वतास्त्र, वज्रास्त्र - ब्रह्मास्त्र, पिशाचास्त्र - पूतनास्त्र, वेतालास्त्र - राक्षसास्त्र, वैष्णावस्त्र - वैष्णवास्त्र द्वारा सृष्ट उपद्रवों व शान्तियों का वर्णन ), वा.रामायण १.३०.२०( विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के प्रसंग में राम द्वारा मारीच राक्षस पर मानवास्त्र/शीतेषु का प्रयोग करके उसे लङ्का में फेंकने का उल्लेख ), १.७६.८( मिथिला में धनुष भङ्ग व सीता से विवाह के पश्चात् राम द्वारा वैष्णव धनुष पर शर का सन्धान करके परशुराम के तप से अर्जित तेज व वीर्य का नाश करना ), ३.२७.१३( राम द्वारा त्रिशिरा राक्षस पर १४ शरों द्वारा प्रहार का उल्लेख ), ३.२८.३१( राम द्वारा खर राक्षस पर १३ शरों द्वारा प्रहार करके उसके रथ आदि को नष्ट करना ), ३.३०.२५( राम द्वारा इन्द्र - प्रदत्त शर द्वारा खर के वध का उल्लेख ), ४.१२.३( बाली वध से पूर्व राम द्वारा एक बाण से ७ साल वृक्षों व ७ भूमियों का भेदन ), ५.४७.१४( अक्षकुमार द्वारा हनुमान के सिर में तीन बाणों द्वारा प्रहार ), ५.४८.३४( अशोकवाटिका में इन्द्रजित् के शरों के व्यर्थ होने पर इन्द्रजित् द्वारा ब्रह्मास्त्र से हनुमान को बांधना ), ६.२२.३६( राम द्वारा समुद्र पर प्रयुक्त ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित बाण का द्रुमकुल्य देश में गिर कर पृथिवी पर मरुभूमि की सृष्टि करना ), ६.४५.१२( इन्द्रजित् द्वारा राम व लक्ष्मण को कङ्क पत्र युक्त इषु जाल में बद्ध करना ), ६.४५.२३( इन्द्रजित् द्वारा राम का बन्धन करने के पश्चात् उन्हें नाराच, भल्ल, अञ्जलिक, वत्सदन्त आदि बाणों से विद्ध करना ), ६.४६.१८( इन्द्रजित् द्वारा नील पर ९, मैन्द व द्विविद पर ३-३, जाम्बवान् पर १, हनुमान पर १० तथा गवाक्ष व शरभ पर २-२ बाणों द्वारा प्रहार का उल्लेख ), ६.५०.३७( सुपर्ण गरुड के आगमन पर शर रूपी नागों द्वारा राम व लक्ष्मण का बन्धन त्याग कर पलायन, शर रूपी नागों का कद्रू- पुत्र होने का उल्लेख ), १०.६७.१५५( राम द्वारा वायव्य अस्त्र से कुम्भकर्ण की दक्षिण बाहु, ऐन्द्रास्त्र से अभिमन्त्रित बाण से सव्य बाहु, अर्धचन्द्र बाणों से पादों तथा इन्द्रास्त्र से अभिमन्त्रित बाण द्वारा सिर काटना ), ६.७१.९१( अतिकाय व लक्ष्मण द्वारा एक दूसरे पर ऐषीकास्त्र, ऐन्द्रास्त्र, याम्यास्त्र, वायव्यास्त्र से अभिमन्त्रित बाण छोडना, लक्ष्मण द्वारा ब्रह्मास्त्र से अतिकाय का वध ), ६.७३.४६( इन्द्रजित् द्वारा गन्धमादन पर १८, नल पर ९, मैन्द पर ७, गज पर ५, जाम्बवान् पर १०, नील पर ३० बाणों द्वारा प्रहार ), ६.७६.६( रावण - सेनानी शोणिताक्ष द्वारा अङ्गद पर क्षुर, क्षुरप्र, नाराच, वत्सदन्त आदि शरों द्वारा प्रहार ), ६.७९.३८( राम द्वारा पावकास्त्र से अभिमन्त्रित शर से मकराक्ष का वध ), ६.९०.४६( इन्द्रजित् व लक्ष्मण द्वारा एक दूसरे पर याम्यास्त्र व कुबेरास्त्र, रौद्रास्त्र व वारुणास्त्र, आग्नेयास्त्र व सौर्यास्त्र, आसुरास्त्र व माहेश्वरास्त्र से अभिमन्त्रित बाणों का प्रयोग, लक्ष्मण द्वारा ऐन्द्रास्त्र से इन्द्रजित् का वध, ऐन्द्रास्त्र की प्रशंसा ), ६.९९.४१( रावण द्वारा राम पर आसुरास्त्र के प्रयोग से सिंह, व्याघ्र, कङ्क, कोक आदि आदि मुखों वाले शरों का प्रकट होना, राम के आग्नेयास्त्र से आसुरास्त्र की शान्ति ), ६.१०२.२०( रावण द्वारा राम पर प्रयुक्त राक्षसास्त्र से सर्प रूप धारी शरों की सृष्टि, गरुडास्त्र से राक्षसास्त्र की शान्ति ), ६.१०२.६२( रावण के शील द्वारा राम के बाणों को व्यर्थ करना ), ६.१०८.६( राम द्वारा रावण वध हेतु प्रयुक्त ब्रह्मास्त्र से निर्मित शर के स्वरूप का वर्णन : आकाशमय शरीर, फल में अग्नि व सूर्य की स्थिति आदि आदि ), ७.६९.१८( शत्रुघ्न द्वारा लवणासुर के वध के लिए प्रयुक्त विष्णु - निर्मित शर के स्वरूप का वर्णन व प्रशंसा ), द्र. इष, इषीका, धनुष, बाण, शर, पुष्पेषु Ishu

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